Any poem in hindi. Patriotic Poems in Hindi 2019-01-13

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5 Best Poems of Rabindranath Tagore

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इंदुमती के मृत्यु शोक से अज रोया या तुम रोये थे? I certainly enjoyed writing this answer and re-reading all the poems! उस दिन तारों ने देखा था हिन्दुस्तानी विश्वास नया. जला दिए गए उसी नहीं मौजूद मकान में मैं लौटता हूँ बार-बार वह मैं जो दरअसल अब नहीं हूँ क्योंकि उस मकान में अपनों के साथ मैं भी जला दिया गया था - सुशांत सुप्रिय विडम्बना कितनी रोशनी है फिर भी कितना अँधेरा है कितनी नदियाँ हैं फिर भी कितनी प्यास है कितनी अदालतें हैं फिर भी कितना अन्याय है कितने ईश्वर हैं फिर भी कितना अधर्म है कितनी आज़ादी है फिर भी कितने खूँटों से बँधे हैं हम - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh खेलो रंग अबीर उड़ावो लाल गुलाल लगावो । पर अति सुरंग लाल चादर को मत बदरंग बनाओ । न अपना रग गँवाओ । - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh देख कर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले । आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही मानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कही जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं । जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं आज कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहीं बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिए वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए । व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के शिखर वे घने जंगल जहाँ रहता है तम आठों पहर गर्जते जल-राशि की उठती हुई ऊँची लहर आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट ये कंपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं । - सुशांत सुप्रिय मैं ढाई हाथ का आदमी हूँ मेरा ढाई मील का ' ईगो ' है मेरा ढाई इंच का दिल है दिल पर ढाई मन का बोझ है - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी। सोचने फिर-फिर यही जी में लगी, आह! चल मनहर मइया ने सिर हिला दिया, देख रे! He did know Hindi as a national leader and educator ofIndia but he is not known to have written any poems in Hindi. Poems help kids to develop the vocabulary and overall understanding of languages. मैं अबला हूँ कातर, दीन! नव अशोक पल्लव के बंदनवार बँधाओ, जय भारत गाओ, स्वतंत्र जय भारत गाओ! This poem is eternal and ever so touching. That day the stars of the sky saw an Indian faith all new, when with their blood, the braves wrote India's history anew. श्रम-सीकर प्रहार पर जीकर, बना लक्ष्य आराध्य मैं हूँ एक सिपाही, बलि है मेरा अन्तिम साध्य! मोरी मइया, नादान मैं तो क्या जानूँ हूँ! धीरे से सूने आँगन में फैला जब जातीं हैं रातें, भर भरकर ठंढी साँसों में मोती से आँसू की पातें; उनकी सिहराई कम्पन में किरणों के प्यासे चुम्बन में! I am not very sure how many people know this person, even I am not very confident but have read some of his poems. जहाँ सूरज भी रोज , नदियों में नहाता है……… आज भी यहाँ मुर्गा ही , बांग लगाकर जगाता है!! स्वर्गीय भावों से भरे ऋषि होम करते थे जहाँ, उन ऋषिगणों से ही हमारा था हुआ उद्भव यहाँ ।। १८ ।। - रामावतार त्यागी Ramavtar Tyagi गूंजी थी मेरी गलियों में, भोले बचपन की किलकारी । छूटी थी मेरी गलियों में, चंचल यौवन की पिचकारी ॥ - रामधारी सिंह दिनकर Ramdhari Singh Dinkar खण्ड तीन - भारत-दर्शन संकलन Collections हम भारतीयों का सदा है, प्राण वन्देमातरम् । हम भूल सकते है नही शुभ तान वन्देमातरम् । । देश के ही अन्नजल से बन सका यह खून है । नाड़ियों में हो रहा संचार वन्देमातरम् । । स्वाधीनता के मंत्र का है सार वन्देमातरम् । हर रोम से हर बार हो उबार वन्देमातरम् ।। घूमती तलवार हो सरपर मेरे परवा नही । दुश्मनो देखो मेरी ललकार वन्देमातरम् ।। धार खूनी खच्चरों की बोथरी हो जायगी । जब करोड़ों की पड़े झंकार वन्देमात रम् ।। टांग दो सूली पै मुझको खाल मेरी खींच लो । दम निकलते तक सुनो हुंकार वन्देमात रम् । । देश से हम को निकालो भेज दो यमलोक को । जीत ले संसार को गुंजार वन्देमात रम् ।। - रीता कौशल आँखें बरबस भर आती हैं, जब मन भूत के गलियारों में विचरता है । सोच उलझ जाती है रिश्तों के ताने-बाने में, एक नासूर सा इस दिल में उतरता है । - सुशांत सुप्रिय बरसों बाद लौटा हूँ अपने बचपन के स्कूल में जहाँ बरसों पुराने किसी क्लास-रूम में से झाँक रहा है स्कूल-बैग उठाए एक जाना-पहचाना बच्चा - द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी उठो धरा के अमर सपूतो पुनः नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो। - रबीन्द्रनाथ टैगोर Rabindranath Tagore अनसुनी करके तेरी बात न दे जो कोई तेरा साथ तो तुही कसकर अपनी कमर अकेला बढ़ चल आगे रे-- अरे ओ पथिक अभागे रे । - भवानी प्रसाद मिश्र Bhawani Prasad Mishra कलम अपनी साध और मन की बात बिल्कुल ठीक कह एकाध। - भारत-दर्शन संकलन Collections फांसी का झूला झूल गया मर्दाना भगत सिंह । दुनियां को सबक दे गया मस्ताना भगत सिंह ।। फांसी का झूला.

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Patriotic Poems in Hindi

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मान लेना वसंत आ गया डी. Vakt se sath dhire dhire badal raha tha main…. धर्मेन्द्र कुमार निवातियाँ StumbleUpon रह रहकर टूटता रब का कहर खंडहरों में तब्दील होते शहर सिहर उठता है बदन देख आतंक की लहर आघात से पहली उबरे नहीं तभी होता प्रहार ठहर ठहर कैसी उसकी लीला है ये कैसा उमड़ा प्रकति का क्रोध विनाश लीला कर क्यों झुंझलाकर करे प्रकट रोष अपराधी जब अपराध करे सजा फिर उसकी सबको क्यों मिले पापी बैठे दरबारों में जनमानष को पीड़ा का इनाम मिले हुआ अत्याचार अविरल इस जगत जननी पर पहर — पहर कितना सहती, रखती संयम आवरण पर निश दिन पड़ता जहर हुई जो प्रकति संग छेड़छाड़ उसका पुरस्कार हमको पाना होगा लेकर सीख आपदाओ से अब तो दुनिया को संभल जाना होगा कर क्षमायाचना धरा से पश्चाताप की उठानी होगी लहर शायद कर सके हर्षित जगपालक को, रोक सके जो वो कहर बहुत हो चुकी अब तबाही बहुत उजड़े घरबार,शहर कुछ तो करम करो ऐ ईश अब न ढहाओ तुम कहर!! निवातियाँ संभल जाओ ऐ दुनिया वालो वसुंधरा पे करो घातक प्रहार नही! नहीं अब गाया जाता देव! » » Hindi Hindi Poems Hindi Poems. . I love a lot of poems in Hindi which evoke love for India. I only corrected some grammatical errors and some mistakes inpunctuation.

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Poem on friendship in hindi सच्चा दोस्त कविताएं

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When he dies, he will go to the useless dust from where he was bornand upon his death, no one will sing for him, no one will honourhim. धर्मेन्द्र कुमार निवातियाँ रह रहकर टूटता रब का कहर खंडहरों में तब्दील होते शहर सिहर उठता है बदन देख आतंक की लहर आघात से पहली उबरे नहीं तभी होता प्रहार ठहर ठहर कैसी उसकी लीला है ये कैसा उमड़ा प्रकति का क्रोध विनाश लीला कर क्यों झुंझलाकर करे प्रकट रोष अपराधी जब अपराध करे सजा फिर उसकी सबको क्यों मिले पापी बैठे दरबारों में जनमानष को पीड़ा का इनाम मिले हुआ अत्याचार अविरल इस जगत जननी पर पहर — पहर कितना सहती, रखती संयम आवरण पर निश दिन पड़ता जहर हुई जो प्रकति संग छेड़छाड़ उसका पुरस्कार हमको पाना होगा लेकर सीख आपदाओ से अब तो दुनिया को संभल जाना होगा कर क्षमायाचना धरा से पश्चाताप की उठानी होगी लहर शायद कर सके हर्षित जगपालक को, रोक सके जो वो कहर बहुत हो चुकी अब तबाही बहुत उजड़े घरबार,शहर कुछ तो करम करो ऐ ईश अब न ढहाओ तुम कहर!! इतना ही नही ये Hindi Poems on Nature स्कूल मे पढ़ने वेल विधार्थीयों के भी काम आएगा. । किसने बाजी राव पेशवा गायब कहां कराया था, बिन अपराध किसानों पर कस के गोले बरसाया था, किला ढहाया चहलारी का राज पाल कटवाया था, धुंध पंत तातिया हरी सिंह नलवा गर्द कराया था, इन नर सिंहों के बदले पर नर सिंह रूप प्रगटाऊंगा, जब तक तुझको. धन्य आज का स्वर्ण-दिवस, नव लोक जागरण, नव संस्कृति आलोक करे जन भारत वितरण! युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से, अब रोष के मारे हुए, वे दहकते अंगार-से । निश्चय अरुणिमा-मित्त अनल की जल उठी वह ज्वाल सी, तब तो दृगों का जल गया शोकाश्रु जल तत्काल ही। साक्षी रहे संसार करता हूँ प्रतिज्ञा पार्थ मैं, पूरा करुंगा कार्य सब कथानुसार यथार्थ मैं। जो एक बालक को कपट से मार हँसते हैँ अभी, वे शत्रु सत्वर शोक-सागर-मग्न दीखेंगे सभी। अभिमन्यु-धन के निधन से कारण हुआ जो मूल है, इससे हमारे हत हृदय को, हो रहा जो शूल है, उस खल जयद्रथ को जगत में मृत्यु ही अब सार है, उन्मुक्त बस उसके लिये रौ'र'व नरक का द्वार है। उपयुक्त उस खल को न यद्यपि मृत्यु का भी दंड है, पर मृत्यु से बढ़कर न जग में दण्ड और प्रचंड है । अतएव कल उस नीच को रण-मध्य जो मारूँ न मैं, तो सत्य कहता हूँ कभी शस्त्रास्त्र फिर धारूँ न मैं। अथवा अधिक कहना वृथा है, पार्थ का प्रण है यही, साक्षी रहे सुन ये वचन रवि, शशि, अनल, अंबर, मही। सूर्यास्त से पहले न जो मैं कल जयद्रथ-वध करूँ, तो शपथ करता हूँ स्वयं मैं ही अनल में जल मरूँ। - मैथिलीशरण गुप्त Mathilishran Gupt - रामधारी सिंह दिनकर Ramdhari Singh Dinkar जला अस्थियाँ बारी-बारी चिटकाई जिनमें चिंगारी, जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल कलम, आज उनकी जय बोल। - रामधारी सिंह दिनकर Ramdhari Singh Dinkar सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं - महादेवी वर्मा Mahadevi Verma कितनी करूणा कितने संदेश पथ में बिछ जाते बन पराग गाता प्राणों का तार तार अनुराग भरा उन्माद राग आँसू लेते वे पथ पखार जो तुम आ जाते एक बार - महादेवी वर्मा Mahadevi Verma वे मुस्काते फूल, नहीं जिनको आता है मुर्झाना, वे तारों के दीप, नहीं जिनको भाता है बुझ जाना। - महादेवी वर्मा Mahadevi Verma मैं नीर भरी दुःख की बदली, स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रंदन में आहत विश्व हँसा, नयनो में दीपक से जलते, पलकों में निर्झनी मचली! देवो की इस पावन धरती पर बचा धर्म -कर्म का अब नाम नही!! ये मन की तराजू पर तोलो । कभी कभी खुद से बात करो । कभी कभी खुद से बोलो । - सुमित्रानंदन पंत Sumitranandan Pant मैं नहीं चाहता चिर-सुख, मैं नहीं चाहता चिर-दुख, सुख दुख की खेल मिचौनी खोले जीवन अपना मुख! क्या वीणा की स्वर-लहरी का सुनूँ मधुरतर नाद?. I won the first prize! मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे चढ़ गए भेट राजनितिक के लोभ वन सम्पदा, नदी पहाड़, झरने इनको मिटा रहा इंसान हर रोज!! कितना था रहा निखर। मिलने चलते अब दो कन आकर्षण -मय चुम्बन बन दल की नस-नस में बह जाती लघु-मघु धारा सुन्दर। हिलता-डुलता चंचल दल, ये सब कितने हैं रहे मचल कन-कन अनन्त अम्बुधि बनते कब रूकती लीला निष्ठुर । तब क्यों रे, फिर यह सब क्यों यह रोष भरी लीला क्यों? The unrivalled poem conveys the message that what matters more at death, are the things that are least considered by man. He did it at the request of his favourite Sri Lankan student at Santiniketan, Ananda Samarkun, who later translated the lyrics into Sinhala. अगर आपको इसके बारे में अच्छे से पढ़ना है तो आप वाला आर्टिकल पढ़े.

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Maa

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Khawab jo bhi the es dil mein kam d bewajah…. ।३३। प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला, छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला, छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४। मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला, हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ, छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५। साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला, तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला, अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते, प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६। उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला, बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला, जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७। अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला, पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८। किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला, किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९। साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला, जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला, योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए, देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०। वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला, रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला, विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में, पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१। चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला, जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला, मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते, चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२। घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला, अरूण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला, लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं, हंस मज्ञल्तऌा होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३। हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला, चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला, कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं, पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४। धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला, वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला, अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता, स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५। दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला, ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला, कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को? He always looks towards himself but no one else. He lives among us even to this day through his works of eloquent, poetic prose and his comprehension of the human psychology. इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरुँ, सिंधँु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८। क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला, क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला, थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को, प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९। लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला, लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला, लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का, लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०। कर ले, कर ले कंजूसी तू मुझको देने में हाला, दे ले, दे ले तू मुझको बस यह टूटा फूटा प्याला, मैं तो सब्र इसी पर करता, तू पीछे पछताएगी, जब न रहूँगा मैं, तब मेरी याद करेगी मधुशाला।।७१। ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला, गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला, साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा, दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।।७२। क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुर्बल मानव मिटटी का प्याला, भरी हुई है जिसके अंदर कटु-मधु जीवन की हाला, मृत्यु बनी है निर्दय साकी अपने शत-शत कर फैला, काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला।।७३। प्याले सा गढ़ हमें किसी ने भर दी जीवन की हाला, नशा न भाया, ढाला हमने ले लेकर मधु का प्याला, जब जीवन का दर्द उभरता उसे दबाते प्याले से, जगती के पहले साकी से जूझ रही है मधुशाला।।७४। अपने अंगूरों से तन में हमने भर ली है हाला, क्या कहते हो, शेख, नरक में हमें तपाएगी ज्वाला, तब तो मदिरा खूब खिंचेगी और पिएगा भी कोई, हमें नमक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला।।७५। यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूँगा पी हाला, पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला, क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला।।७६। यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला, यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला, हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर, मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।।७७। याद न आए दूखमय जीवन इससे पी लेता हाला, जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला, शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है, पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला।।७८। गिरती जाती है दिन प्रतिदन प्रणयनी प्राणों की हाला भग्न हुआ जाता दिन प्रतिदन सुभगे मेरा तन प्याला, रूठ रहा है मुझसे रूपसी, दिन दिन यौवन का साकी सूख रही है दिन दिन सुन्दरी, मेरी जीवन मधुशाला।।७९। यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला, पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला, यह अंितम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है, पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।८०। ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला, हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जीव्हा भूले कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१। मेरे अधरों पर हो अंितम वस्तु न तुलसीदल प्याला मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला, मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२। मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला, दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।।८३। और चिता पर जाये उंढेला पत्र न घ्रित का, पर प्याला कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला, प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना पीने वालांे को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४। नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला, जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५। ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला, पंिडत अपनी पोथी भूला, साधू भूल गया माला, और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला, किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६। यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला, चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला, स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल, ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७। पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों - साकी बाला, नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला, साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है, कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८। शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला, 'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला, कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं । सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं ॥ धूमधाम से साजबाज से मंदिर में वे आते हैं । मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुएँ लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं ॥ मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी । फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी ॥ धूप दीप नैवेद्य नहीं है झांकी का शृंगार नहीं । हाय! The group has produced several Hindi productions which include innovative and exclusive production value, contemporary aesthetics and unique, contemporary content have been the attributes of Each swatantra theatre production. इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से फूले हुए पलस्तर, खिरती है चूने-भरी रेत खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह - खुद-ब-खुद कोई बड़ा चेहरा बन जाता है, स्वयमपि मुख बन जाता है दिवाल पर, नुकीली नाक और भव्य ललाट है, दृढ़ हनु कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति। कौन वह दिखाई जो देता, पर नहीं जाना जाता है! सबके मुंह पे पाश, हर कोई मुंह मोड़के बैठे, हर कोई डर जाय! He is there where the tiller is tilling the hard ground and where the pathmaker is breaking stones. नहीं ही दीखता, किंतु वह रहा घूम तिलस्मी खोह में गिरफ्तार कोई एक, भीत-पार आती हुई पास से, गहन रहस्यमय अंधकार ध्वनि-सा अस्तित्व जनाता अनिवार कोई एक, और मेरे हृदय की धक्-धक् पूछती है - वह कौन सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई! चलो, ये भी ठीक रहा!! सुख-दुख के मधुर मिलन से यह जीवन हो परिपूरन; फिर घन में ओझल हो शशि, फिर शशि से ओझल हो घन! Yet stars will watch at night, and morning rise as before, and hours heave like sea waves casting up pleasures and pains.


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लहलाते थे कभी वृक्ष हर आँगन में बचा शेष उन गलियारों का श्रृंगार नही! ।।८।। - रामावतार त्यागी Ramavtar Tyagi जब चाहा मैंने तूफ़ानों के, अभिमानों को कुचल दिया । हँसकर मुरझाई कलियों को, मैंने उपवन में बदल दिया ।। - मैथिलीशरण गुप्त Mathilishran Gupt भू-लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ? सुबह की पहली किरण जब छू लेती हें तेरी बंद पलकें चारों तरफ कलिओं से तेरी खुशबू की हो जाती बरसात. जहाँ हर पनहारन मटकी लिए, धरे राधा का रूप है!! जन्म-दिन के आस-पास या शायद उसी रात. झंकारों का कभी सुना है भीषण वाद विवाद? This list of poetic works is an excellent resource. । किसने श्री रणजीत सिंह के बच्चों को कटवाया था, शाह जफर के बेटों के सर काट उन्हें दिखलाया था, अजनाले के कुएं में किसने भोले भाई तुपाया था, अच्छन खां और शम्भु शुक्ल के सर रेती रेतवाया था, इन करतूतों के बदले लंदन पर बम बरसाऊंगा, जब तक तुझको. अलग़ -अलग़ रुप का आकार बनाया , फिर भी सब कुश सामूहिक रचाया , सबको है काम पे लगाया , नीति नियम से सब कुश है चलाया , हर रचना में रहस्य है शिपाया , दूृश्य कल्पनाओं में जग बसाया , सब कुश धरा पे है उगाया , समय की ढ़ाल पे इसमें ही समाया! दिन-रात प्राणदायिनी हवा चलाती है प्रकृति मुफ्त में हमें ढेरों साधन उपलब्ध कराती है प्रकृति….

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महादेवी वर्मा कुछ कविताएँ

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आज हम शहरातियों को पालतू मालंच पर सँवरी जुही के फूल-से सृष्टि के विस्तार का, ऐश्वर्य का, औदार्य का कहीं सच्चा, कहीं प्यारा एक प्रतीक बिछली घास है या शरद् की साँझ के सूने गगन की पीठिका पर दोलती कलगी अकेली बाजरे की। और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूँ यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट जाता है और मैं एकांत होता हूँ समर्पित। शब्द जादू हैं- मगर क्या यह समर्पण कुछ नहीं है? Below are examples of poems for and about the Hindustani language and people of northern India. विकास की दौड़ में प्रकृति को नजरंदाज करना बुद्धिमानी नहीं है क्योंकि सवाल है हमारे भविष्य का, यह कोई खेल-कहानी नहीं है…. सूर्य को है ऐसा बनाया, जिसने पूरी सुृष्टि को चमकाया , जो कभी नहीं बुझ पाया ,ना जाने किस ईंधन से जगता है , कभी एक शोर , कभी दूसरे शोर से , धरती को अभिनदंन करता है! द्वार खुलने दे, मैं हूँ एक सिपाही! भारत का दासत्व दासता थी भू-मन की, विकसित आज हुई सीमाएँ जन-जीवन की! इस पोस्ट मे जो Prakriti par kavita लिखी गयी है वो हम सबको प्रकृति के प्रति जागरूक करता है की कैसे हमारी प्रकृति दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है. Gir gaya tha uske dar pe aur sambhal raha tha main…. ओ परम तपस्वी परम वीर ओ सुकृति शिरोमणि, ओ सुधीर कुर्बान हुए तुम, सुलभ हुआ सारी दुनिया को ज्ञान बापू महान, बापू महान!! मगर मैया तू तो अंग्रेजी-फ्रेंच-पुर्तगीज चाइनीज और जापानी सब कुछ समझ लेती ही है नेल्सन मंडेला के यहाँ से लोग-बाग आते ही रहते हैं. दीपक लौ-सी दुबली कनक छबीली, मौन मधुरिमा भरी, लाज ही-सी साकार लजीली, तुम नारी हो? पुरुष हो गया हाय पिशाच! Today, with great endurance it stands on a pedestal channel … ed towards contemporary notions and social issues.

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Poem on friendship in hindi सच्चा दोस्त कविताएं

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उन्नत लगता चंद्रकला-स्मित आज हिमाचल, चिर समाधि से जाग उठे हों शंभु तपोज्ज्वल! As my days pass in the crowded market of this world and my hands grow full with the daily profits, let me ever feel that I have gained nothing —let me not forget for a moment, let me carry the pangs of this sorrow in my dreams and in my wakeful hours. बागीचों के वही नज़ारे हैं…!! खीचों राम-राज्य लाने को, भू-मंडल पर त्रेता! This list of Hindi poems is composed of the works of modern international poet members of PoetrySoup. एक बात तो बिल्कुल सॉफ है की अगर कुदरत और प्रकृति है तभी हम है. निवतियाँ सुन्दर रूप इस धरा का, आँचल जिसका नीला आकाश, पर्वत जिसका ऊँचा मस्तक,2 उस पर चाँद सूरज की बिंदियों का ताज नदियों-झरनो से छलकता यौवन सतरंगी पुष्प-लताओं ने किया श्रृंगार खेत-खलिहानों में लहलाती फसले बिखराती मंद-मंद मुस्कान हाँ, यही तो हैं,…… इस प्रकृति का स्वछंद स्वरुप प्रफुल्लित जीवन का निष्छल सार फूल शिशिर मधुकर लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का गर्मी तो अभी दूर है वर्षा ना आएगी फूलों की महक हर दिशा में फ़ैल जाएगी पेड़ों में नई पत्तियाँ इठला के फूटेंगी प्रेम की खातिर सभी सीमाएं टूटेंगी सरसों के पीले खेत ऐसे लहलहाएंगे सुख के पल जैसे अब कहीं ना जाएंगे आकाश में उड़ती हुई पतंग ये कहे डोरी से मेरा मेल है आदि अनंत का लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का ज्ञान की देवी को भी मौसम है ये पसंद वातवरण में गूंजते है उनकी स्तुति के छंद स्वर गूंजता है जब मधुर वीणा की तान का भाग्य ही खुल जाता है हर इक इंसान का माता के श्वेत वस्त्र यही तो कामना करें विश्व में इस ऋतु के जैसी सुख शांति रहे जिसपे भी हो जाए माँ सरस्वती की कृपा चेहरे पे ओज आ जाता है जैसे एक संत का लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का गाँव मेरा इस लहलाती हरियाली से , सजा है ग़ाँव मेरा…. अब तक अंगारों से। अंगार, विभूषण यह उनका विद्युत पीकर जो आते हैं, ऊँघती शिखाओं की लौ में चेतना नयी भर जाते हैं। उनका किरीट, जो कुहा-भंग करके प्रचण्ड हुंकारों से, रोशनी छिटकती है जग में जिनके शोणित की धारों से। झेलते वह्नि के वारों को जो तेजस्वी बन वह्नि प्रखर, सहते ही नहीं, दिया करते विष का प्रचण्ड विष से उत्तर। अंगार हार उनका, जिनकी सुन हाँक समय रुक जाता है, आदेश जिधर का देते हैं, इतिहास उधर झुक जाता है। - मैथिलीशरण गुप्त Mathilishran Gupt उस काल मारे क्रोध के तन कांपने उसका लगा, मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा। मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ, प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ? । डाक्टरों से चिरंजन को जहर दिलाने वाला कौन? सत्कार्य्य-भूषण आर्य्यगण जितने यहाँ पर हैं हुए । हैं रह गये यद्यपि हमारे गीत आज रहे सहे । पर दूसरों के भी वचन साक्षी हमारे हो रहे ।। ३० ।। - भारत-दर्शन संकलन Collections फ़ैला जहाँ में शोर मित्रो! सब तुम क्या इसने पौरुषहीन? सदियों रहे साथ, पर दोनों पानी तेल सरीखे ; हम दोनों को एक दूसरे के दुर्गुन ही दीखे! When he returns home, his money and power lures him andhe strives to return to the same place for his power and riches. धूल उड़ी या रंग उड़ा है, हाथ रही अब कोरी झोली। आँखों में सरसों फूली है, सजी टेसुओं की है टोली। पीली पड़ी अपत, भारत-भू, फिर भी नहीं तनिक तू डोली! Literature Under This Category - फणीश्वरनाथ रेणु Phanishwar Nath 'Renu' साजन! पथ दे, खुला देख वह द्वार!! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नहीं पर मैंने पाया सीख तुम्हारा सा मनमोहन गान। भूलती थी मैं सीखे राग बिछलते थे कर बारम्बार, तुम्हें तब आता था करुणेश! यहाँ नहीं लज्जा का योग भीख माँगने का है रोग पेट बेचते हैं हम लोग लोगे मोल? सुन्दर स्वच्छ सँवारी हिन्दी । सरल सुबोध सुधारी हिन्दी । हिन्दी की हितकारी हिन्दी । जीवन-ज्योति हमारी हिन्दी । अच्छी हिन्दी! Put off thy holy mantle and even like him come down on the dusty soil! मैं सुन रहा कहानी। कोई निरपराध को मारे तो क्यों न उसे उबारे? अंधेरे में डूबा है उर्मिला का कक्ष अंधेरा जो पिछले चौदह वर्षों से रच बस गया है उसकी आत्मा में जैसे मंदिर के गर्भ-गृह में जमता चला जाता है सुरमई धुँआ और धीमा होता जाता है प्रकाश! और गर्मी की रातो में, खटिया बिछाये बैठे लोग!! Another book I can read any number of times is ' Madhushala' of course. I also quite appreciate the poems of Atal Bihari Vajpayee, the former Prime Minister of India.

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Hindi Poems (हिंदी कविताएं / Poetry)

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ये प्रकृति पे आधारित Hindi Poems अलग अलग कवियों की रचनाएँ है जिनके नाम हर Poem के साथ दिया गया है. निवातियाँ संभल जाओ ऐ दुनिया वालो वसुंधरा पे करो घातक प्रहार नही! This article has also been viewed 57,550 times. चली आयी ॥ पूजा और पुजापा प्रभुवर! It will features 30 eminent and emerging poets including hindi poets from across the world, who will read excerpts of their poems as well as have discussions with the audience. Chanda kehata meri chhaya, meethi neend sulaati hai. Rare is its lowliest seat, rare is its meanest of lives.

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